
राजस्थान के प्रमुख संत एवं सम्प्रदाय जैसे दादू दयाल, विश्नोई, जसनाथी, रामस्नेही, नाथ सम्प्रदाय, संत पीपा एवं संत धन्ना का इतिहास, सिद्धांत, शिक्षाएँ एवं परीक्षा उपयोगी महत्वपूर्ण तथ्यों का सम्पूर्ण अध्ययन करें। RPSC, CET, REET, Patwar, Police, VDO एवं अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए महत्वपूर्ण Rajasthan Art & Culture Notes।
परिचय राजस्थान की वीरभूमि केवल योद्धाओं के लिए ही नहीं, बल्कि महान संतों, भक्तों और समाज सुधारकों के लिए भी जानी जाती है। यहाँ भक्ति आंदोलन की दोनों मुख्य धाराओं—सगुण भक्ति (ईश्वर को मूर्ति या साकार रूप में पूजना) और निर्गुण भक्ति (ईश्वर को निराकार और कण-कण में व्याप्त मानना)—का व्यापक प्रभाव रहा है।
प्रतियोगी परीक्षाओं (REET, KVS, RSMSSB, RPSC) में दादू पंथ की शाखाओं, विश्नोई और जसनाथी सम्प्रदाय के नियमों, रामस्नेही सम्प्रदाय की पीठों और विभिन्न संतों की कर्मस्थली से निश्चित रूप से प्रश्न पूछे जाते हैं। महारथ अकादमी के इस विशेष नोट्स में हम राजस्थान के प्रमुख संतों और सम्प्रदायों का विस्तार से अध्ययन करेंगे।
1. दादू दयाल और दादू पंथ (Dadu Dayal and Dadu Panth)
दादू दयाल को ‘राजस्थान का कबीर’ (Kabir of Rajasthan) कहा जाता है। इनका सम्प्रदाय पूर्णतः निर्गुण भक्ति पर आधारित था।
- जन्म: 1544 ई. में अहमदाबाद (गुजरात) में। बाद में ये राजस्थान आ गए और नारायणा / नरेना (जयपुर ग्रामीण) को अपनी मुख्य कर्मस्थली बनाया।
- अकबर से भेंट: 1585 ई. में आमेर के राजा भगवंत दास के प्रयासों से फतेहपुर सीकरी में दादू दयाल ने मुग़ल सम्राट अकबर से भेंट की थी।
- दादू पंथ की स्थापना: इन्होंने 1574 ई. में ‘दादू पंथ’ की स्थापना की। दादू पंथी लोग शव को न जलाते हैं न दफनाते हैं, बल्कि पशु-पक्षियों के खाने के लिए जंगल में छोड़ देते हैं। दादू जी का शव नारायणा के पास ‘भैराणा की पहाड़ी’ (दादू खोल) में रखा गया था।
- साहित्य: इनके उपदेश ‘दादू दयाल री वाणी’ और ‘दादू दयाल रा दूहा’ में संकलित हैं, जिनकी भाषा ढूंढाड़ी (सधुक्कड़ी) है।
- प्रमुख शिष्य (52 स्तंभ): दादू जी के कुल 152 शिष्य थे, जिनमें से 52 शिष्यों को ‘दादू पंथ के 52 स्तंभ’ कहा जाता है।
- रज्जब जी (Rajjab Ji): सांगानेर (जयपुर) के निवासी। दादू जी के उपदेश सुनकर इन्होंने शादी का विचार त्याग दिया और आजीवन दूल्हे के वेश में रहते हुए उपदेश दिए। इनकी रचनाएं ‘रज्जब वाणी’ और ‘सर्वांगी’ हैं।
- सुंदरदास जी: इन्होंने दादू पंथ की ‘नागा शाखा’ की स्थापना की। ये हथियार रखते थे और मराठा आक्रमणों के समय इन्होंने जयपुर राज्य की रक्षा की थी।
- दादू पंथ की 5 शाखाएं: खालसा, विरक्त, खाकी, उत्तरादे और नागा। सत्संग स्थल को ‘अलख दरीबा’ कहा जाता है।
2. जाम्भोजी और विश्नोई सम्प्रदाय (Jambhoji and Bishnoi Sect)
जाम्भोजी को राजस्थान में पर्यावरण वैज्ञानिक (Environmental Scientist) संत के रूप में जाना जाता है।
- जन्म: 1451 ई. में पीपासर (नागौर) में पंवार राजपूत परिवार में। इन्हें ‘भगवान विष्णु का अवतार’ माना जाता है। बचपन का नाम ‘धनराज’ था।
- सम्प्रदाय की स्थापना: 1485 ई. में बीकानेर के ‘समराथल धोरा’ नामक स्थान पर इन्होंने विश्नोई सम्प्रदाय की स्थापना की।
- 29 नियम: इन्होंने अपने अनुयायियों को 29 नियम (बीस + नौ = विश्नोई) दिए। इनमें हरे वृक्ष (विशेषकर खेजड़ी) न काटना और जीव हत्या न करना सर्वोपरि है।
- मुख्य पीठ: मुकाम तालवा (बीकानेर)। यहाँ फाल्गुन और आश्विन अमावस्या को मेला भरता है।
- सिकंदर लोदी पर प्रभाव: जाम्भोजी के प्रभाव से ही दिल्ली के सुल्तान सिकंदर लोदी ने गो-हत्या पर प्रतिबंध लगा दिया था और अकाल के समय बीकानेर में चारा भिजवाया था।
3. जसनाथ जी और जसनाथी सम्प्रदाय (Jasnathi Sect)
- जन्म: 1482 ई. में कतरियासर (बीकानेर) में जाट परिवार में।
- सम्प्रदाय और नियम: इन्होंने जसनाथी सम्प्रदाय चलाया, जिसमें 36 नियम (36 Rules) अनिवार्य हैं। इस सम्प्रदाय के लोग गले में ‘काले रंग का ऊनी धागा’ पहनते हैं और जाल के वृक्ष तथा मोर पंख को पवित्र मानते हैं।
- अग्नि नृत्य (Fire Dance): जसनाथी सम्प्रदाय के सिद्ध अनुयायियों द्वारा कतरियासर में दहकते हुए अंगारों पर ‘फतेह-फतेह’ का उच्चारण करते हुए अद्भुत अग्नि नृत्य किया जाता है।
- सिकंदर लोदी का सम्मान: सिकंदर लोदी ने जसनाथ जी के चमत्कारों से प्रभावित होकर इन्हें 500 बीघा जमीन कतरियासर में भेंट की थी।
4. मीराबाई (Mirabai)
मीराबाई सगुण भक्ति (भगवान कृष्ण) की सबसे महान संत थीं। इन्हें ‘राजस्थान की राधा’ कहा जाता है।
- जन्म: 1498 ई. में कुड़की गाँव (पाली) में राठौड़ परिवार (रतन सिंह राठौड़ की पुत्री) में। बचपन का नाम ‘पेमल’ था।
- विवाह: मेवाड़ के महाराणा सांगा के ज्येष्ठ पुत्र भोजराज के साथ। विवाह के 7 वर्ष बाद भोजराज की मृत्यु हो गई।
- गुरु: इनके आध्यात्मिक गुरु संत रैदास (Raidas) थे (रैदास की छतरी चित्तौड़गढ़ दुर्ग में स्थित है)।
- भक्ति व अंतिम समय: मीराबाई की भक्ति ‘माधुर्य भाव’ (कृष्ण को पति मानना) की थी। जीवन के अंतिम दिनों में ये द्वारिका (गुजरात) चली गईं और वहीं ‘रणछोड़ जी के मंदिर’ में कृष्ण की मूर्ति में विलीन हो गईं।
5. रामस्नेही सम्प्रदाय (Ramsnehi Sect)
यह सम्प्रदाय निर्गुण राम की उपासना करता है। इसके मंदिरों को ‘रामद्वारा’ कहा जाता है, जहाँ मूर्ति के स्थान पर गुरु की ‘वाणी’ रखी जाती है। इस सम्प्रदाय के साधु गुलाबी रंग के वस्त्र पहनते हैं और सिर व दाढ़ी के बाल मुंडवा कर रखते हैं।
राजस्थान में इस सम्प्रदाय की 4 प्रमुख पीठें (शाखाएं) हैं (यह परीक्षाओं का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु है):
- शाहपुरा शाखा (भीलवाड़ा): यह मुख्य पीठ है। इसके संस्थापक स्वामी रामचरण जी थे। यहाँ होली के अगले दिन से ‘फूलडोल महोत्सव’ (Phool Dol Mela) मनाया जाता है।
- रेण शाखा (नागौर): संस्थापक — संत दरियाव जी।
- सिंहथल शाखा (बीकानेर): संस्थापक — संत हरिराम दास जी।
- खेड़ापा शाखा (जोधपुर ग्रामीण): संस्थापक — संत रामदास जी।
6. अन्य महत्वपूर्ण संत एवं सम्प्रदाय
- संत पीपा जी (Sant Pipa): गागरोन (झालावाड़) के शासक थे। राजपाट त्यागकर रामानंद जी के शिष्य बन गए। ये दर्जी समुदाय (Tailor Community) के आराध्य देव हैं। संत पीपा की गुफा टोडा (टोंक) में है और छतरी गागरोन दुर्ग में है।
- लालदास जी: इनका प्रभाव मेवात (अलवर-भरतपुर) क्षेत्र में रहा। इन्होंने हिंदू-मुस्लिम एकता पर बल दिया।
- चरणदास जी: इनका जन्म डेहरा गाँव (अलवर) में हुआ, लेकिन इनकी मुख्य पीठ दिल्ली में है। इस सम्प्रदाय में 42 नियम हैं। चरणदास जी ने नादिरशाह के दिल्ली आक्रमण (1739) की सटीक भविष्यवाणी की थी। इनकी दो प्रसिद्ध शिष्याएं थीं – दयाबाई और सहजोबाई।
- संत मावजी: इन्हें ‘कल्कि अवतार’ माना जाता है। इन्होंने ‘निष्कलंक सम्प्रदाय’ चलाया और डूंगरपुर में बेणेश्वर धाम (सोम-माही-जाखम के त्रिवेणी संगम पर) की स्थापना की। इनके ग्रंथ ‘चोपड़ा’ कहलाते हैं।
- गवरी बाई: वागड़ (डूंगरपुर) की निवासी। कृष्ण भक्ति के कारण इन्हें ‘वागड़ की मीरा’ (Meera of Vagad) कहा जाता है।
- संत हरिदास जी: संन्यास लेने से पहले डाकू थे। इसलिए इन्हें ‘कलयुग का वाल्मीकि’ कहा जाता है। इन्होंने निरंजनी सम्प्रदाय चलाया।
अभ्यास हेतु 20 महत्वपूर्ण प्रश्न (PYQs)
प्रश्न 1: ‘राजस्थान का कबीर’ (Kabir of Rajasthan) किस संत को कहा जाता है? उत्तर: दादू दयाल जी को।
प्रश्न 2: दादू दयाल ने अपनी मुख्य कर्मस्थली और दादू पंथ की मुख्य पीठ कहाँ स्थापित की? उत्तर: नारायणा / नरेना (जयपुर ग्रामीण) में।
प्रश्न 3: आजीवन दूल्हे के वेश में रहते हुए उपदेश देने वाले दादू दयाल के प्रसिद्ध शिष्य कौन थे? उत्तर: रज्जब जी (Rajjab Ji)।
प्रश्न 4: दादू पंथ की ‘नागा शाखा’ (जिन्होंने हथियार उठाए) की स्थापना किसने की थी? उत्तर: सुंदरदास जी ने।
प्रश्न 5: विश्नोई सम्प्रदाय की स्थापना जाम्भोजी द्वारा किस स्थान पर की गई थी? उत्तर: समराथल धोरा (बीकानेर) में।
प्रश्न 6: पर्यावरण संरक्षण और वृक्षों (खेजड़ी) को न काटने का संदेश देने वाले लोक संत कौन थे? उत्तर: जाम्भोजी (Jambhoji)।
प्रश्न 7: विश्नोई सम्प्रदाय की मुख्य पीठ (Main Peeth) कहाँ स्थित है? उत्तर: मुकाम तालवा (बीकानेर) में।
प्रश्न 8: ‘अग्नि नृत्य’ (Fire Dance) का संबंध राजस्थान के किस सम्प्रदाय से है? उत्तर: जसनाथी सम्प्रदाय से।
प्रश्न 9: जसनाथी सम्प्रदाय के अनुयायियों के लिए कितने नियमों का पालन करना अनिवार्य है? उत्तर: 36 नियमों का (विश्नोई सम्प्रदाय में 29 और चरणदासी सम्प्रदाय में 42 नियम हैं)।
प्रश्न 10: ‘राजस्थान की राधा’ के नाम से प्रसिद्ध मीराबाई का जन्म किस गाँव में हुआ था? उत्तर: कुड़की गाँव (पाली) में।
प्रश्न 11: मीराबाई के आध्यात्मिक गुरु कौन थे, जिनकी छतरी चित्तौड़गढ़ दुर्ग में स्थित है? उत्तर: संत रैदास (Raidas)।
प्रश्न 12: ‘रामस्नेही सम्प्रदाय’ की मुख्य पीठ कहाँ स्थित है? उत्तर: शाहपुरा (भीलवाड़ा) में।
प्रश्न 13: ‘फूलडोल महोत्सव’ (Phool Dol Mela) किस सम्प्रदाय का मुख्य आकर्षण है? उत्तर: रामस्नेही सम्प्रदाय का (शाहपुरा में)।
प्रश्न 14: रामस्नेही सम्प्रदाय की ‘रेण शाखा’ (नागौर) के संस्थापक कौन थे? उत्तर: संत दरियाव जी।
प्रश्न 15: दर्जियों (Tailor Community) के आराध्य देव संत पीपा जी की गुफा कहाँ स्थित है? उत्तर: टोडा (टोंक) में। (इनकी छतरी गागरोन, झालावाड़ में है)।
प्रश्न 16: नादिरशाह के दिल्ली आक्रमण की सटीक भविष्यवाणी राजस्थान के किस संत ने की थी? उत्तर: संत चरणदास जी ने।
प्रश्न 17: दयाबाई और सहजोबाई किस संत की प्रसिद्ध शिष्याएं थीं? उत्तर: संत चरणदास जी की।
प्रश्न 18: ‘वागड़ की मीरा’ (Meera of Vagad) के नाम से किसे जाना जाता है? उत्तर: गवरी बाई को।
प्रश्न 19: राजस्थान के किस संत को ‘कलयुग का वाल्मीकि’ कहा जाता है, जिन्होंने निरंजनी सम्प्रदाय चलाया? उत्तर: संत हरिदास जी को।
प्रश्न 20: बेणेश्वर धाम (डूंगरपुर) की स्थापना करने वाले किस संत को ‘कल्कि अवतार’ माना जाता है? उत्तर: संत मावजी को।
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