
परिचय
मारवाड़ के राठौड़ राजवंश का इतिहास, राव सीहा से महाराजा जसवंत सिंह तक के प्रमुख शासक, युद्ध, प्रशासन एवं महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाओं का विस्तृत अध्ययन करें। RPSC, CET, REET, Patwar, Police, VDO एवं अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए उपयोगी Rajasthan History Notes।
मेवाड़ के इतिहास के बाद, राजस्थान के इतिहास में दूसरा सबसे प्रभावशाली और विस्तृत राजवंश मारवाड़ (जोधपुर) का राठौड़ राजवंश है। राठौड़ों ने अपने शौर्य, स्वाभिमान और कूटनीति से राजपूताना के इतिहास में एक अमिट छाप छोड़ी है। प्रतियोगी परीक्षाओं (RAS, REET, RPSC, RSMSSB) में राव मालदेव के युद्धों, राव चंद्रसेन के स्वाधीनता संग्राम और वीर दुर्गादास राठौड़ की स्वामीभक्ति से सर्वाधिक प्रश्न पूछे जाते हैं।
आज के इस पोस्ट में हम मारवाड़ के राठौड़ वंश की उत्पत्ति और इसके प्रमुख प्रतापी शासकों का विस्तार से अध्ययन करेंगे।
1. राठौड़ वंश की उत्पत्ति और प्रारंभिक शासक
राठौड़ शब्द संस्कृत के ‘राष्ट्रकूट’ शब्द से बना है। मारवाड़ के राठौड़ स्वयं को सूर्यवंशी और भगवान राम के पुत्र ‘कुश’ का वंशज मानते हैं। मुहणौत नैणसी और दयालदास के अनुसार ये कन्नौज के गहड़वाल शासक जयचंद के वंशज थे।
राव सीहा (Rao Siha):
- इन्हें मारवाड़ के राठौड़ वंश का संस्थापक (Founder) या आदिपुरुष कहा जाता है।
- इन्होंने लगभग 1240 ई. में कन्नौज से आकर मारवाड़ के पाली क्षेत्र में अपना राज्य स्थापित किया और ‘खेड़’ (बालोतरा) को अपनी राजधानी बनाया।
- इन्होंने पालीवाल ब्राह्मणों की रक्षा करते हुए अपने प्राण त्यागे थे।
राव चूंडा (Rao Chunda):
- इन्हें मारवाड़ के राठौड़ वंश का वास्तविक संस्थापक (Real Founder) माना जाता है।
- इन्हें ईंदा प्रतिहारों ने मंडोर (Mandore) दुर्ग दहेज में दिया था। राव चूंडा ने मंडोर को राठौड़ों की नई राजधानी बनाया, जिससे मारवाड़ में राठौड़ों की शक्ति का वास्तविक विस्तार हुआ।
2. राव जोधा और जोधपुर की स्थापना (1438 – 1489 ई.)
राव जोधा मारवाड़ के एक अत्यंत पराक्रमी और दूरदर्शी शासक थे।
- आंवल-बांवल की संधि (1453 ई.): यह ऐतिहासिक संधि राव जोधा और मेवाड़ के महाराणा कुंभा के मध्य (हंसाबाई की मध्यस्थता से) सोजत (पाली) में हुई। इसके द्वारा मेवाड़ और मारवाड़ की सीमा का निर्धारण हुआ।
- जोधपुर नगर की स्थापना: 12 मई 1459 ई. को राव जोधा ने आधुनिक जोधपुर शहर बसाया और उसे अपनी राजधानी बनाया।
- मेहरानगढ़ दुर्ग (Mehrangarh Fort): जोधा ने जोधपुर में चिड़ियाटूंक पहाड़ी (Chidiyatunk Hill) पर मेहरानगढ़ दुर्ग का निर्माण करवाया। इस दुर्ग की नींव करणी माता (रिद्धी बाई) के हाथों से रखी गई थी।
3. राव मालदेव (1531 – 1562 ई.)
राव मालदेव का काल मारवाड़ के इतिहास का ‘शौर्य का स्वर्णकाल’ माना जाता है।
- उपाधियां: फारसी इतिहासकारों ने इन्हें ‘हशमत वाला राजा’ (वैभव व गरिमा वाला शासक) और ‘हिंदुस्तान का सबसे शक्तिशाली शासक’ कहा है।
- 52 युद्धों का विजेता: मालदेव ने अपने जीवन में 52 युद्ध लड़े और 58 परगनों पर अधिकार किया। खानवा के युद्ध में मालदेव ने ही मारवाड़ की सेना का नेतृत्व करते हुए राणा सांगा की सहायता की थी।
- रूठी रानी (Roothi Rani): मालदेव का विवाह जैसलमेर के शासक लूणकरण की पुत्री उमादे (Umade) से हुआ था। विवाह की पहली ही रात किसी बात पर उमादे मालदेव से रूठ गईं और आजीवन तारागढ़ दुर्ग (अजमेर) में रहीं। इतिहास में वे ‘रूठी रानी’ के नाम से प्रसिद्ध हैं।
गिरी-सुमेल का युद्ध (5 जनवरी 1544)
- यह युद्ध जैतारण (ब्यावर / पाली सीमा) के पास राव मालदेव और दिल्ली के अफगान शासक शेरशाह सूरी के मध्य लड़ा गया।
- वीर सेनापति: इस युद्ध में मालदेव के दो सबसे वीर सेनापति जैता और कूंपा ने अदम्य साहस का परिचय दिया और लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए।
- शेरशाह सूरी का प्रसिद्ध कथन: राजपूतों की वीरता देखकर शेरशाह सूरी के पसीने छूट गए थे और जीतने के बाद उसने कहा था: “मैं एक मुट्ठी भर बाजरे के लिए पूरे हिंदुस्तान की बादशाहत खो देता।” (I had almost lost the empire of Hindustan for a handful of millet).
4. राव चंद्रसेन (1562 – 1581 ई.)
मालदेव के बाद उनके पुत्र राव चंद्रसेन मारवाड़ के शासक बने। चंद्रसेन राजपूताना के वे प्रथम शासक थे जिन्होंने मुगलों (अकबर) की अधीनता स्वीकार करने से इंकार कर दिया और छापामार (Guerrilla) युद्ध प्रणाली अपनाई।
- प्रमुख उपाधियां:
- मारवाड़ का प्रताप (Pratap of Marwar)
- प्रताप का अग्रगामी (Pathfinder of Pratap): क्योंकि जो रास्ता बाद में महाराणा प्रताप ने चुना, उस पर चंद्रसेन पहले ही चल चुके थे।
- भूला-बिसरा राजा (The Forgotten King): क्योंकि मारवाड़ के इतिहासकारों ने इन्हें वह सम्मान नहीं दिया जिसके ये हकदार थे।
- नागौर दरबार (1570 ई.): अकबर ने अकाल राहत कार्यों के बहाने 1570 में नागौर में दरबार लगाया, जिसका मुख्य उद्देश्य राजपूताना के राजाओं को अधीनता स्वीकार करवाना था। चंद्रसेन इस दरबार में गए, लेकिन अकबर का झुकाव अपने बड़े भाई उदयसिंह की ओर देखकर वे बिना अधीनता स्वीकार किए वहाँ से लौट आए।
- इसके बाद अकबर ने जोधपुर पर अधिकार कर लिया और चंद्रसेन को जीवन भर भद्राजूण, सिवाणा और सारण की पहाड़ियों (पाली) में भटकना पड़ा। 1581 में सारण की पहाड़ियों में उनका देहांत हो गया।
5. मोटा राजा उदयसिंह और मुगलों से संबंध
चंद्रसेन की मृत्यु के बाद 1583 ई. में अकबर ने उनके बड़े भाई उदयसिंह को ‘मोटा राजा’ की उपाधि देकर जोधपुर का शासक बनाया।
- मुगलों की अधीनता: मोटा राजा उदयसिंह मारवाड़ के प्रथम शासक थे जिन्होंने मुगलों की अधीनता स्वीकार की।
- वैवाहिक संबंध: इन्होंने अपनी पुत्री मानी बाई (जगत गोसाईं / जोधाबाई) का विवाह अकबर के पुत्र जहांगीर के साथ किया। इसी जगत गोसाईं की कोख से मुग़ल सम्राट शाहजहां (खुर्रम) का जन्म हुआ था।
6. महाराजा जसवंत सिंह प्रथम (1638 – 1678 ई.)
जसवंत सिंह मारवाड़ के एक अत्यंत शक्तिशाली और विद्वान शासक थे। इनका काल मारवाड़ की कला और साहित्य के विकास के लिए जाना जाता है।
- धर्मत का युद्ध (1658 ई.): मुगलों के उत्तराधिकार युद्ध में जसवंत सिंह ने शाहजहां के बड़े पुत्र दारा शिकोह का पक्ष लिया और औरंगजेब के विरुद्ध धर्मत (मध्य प्रदेश) के युद्ध में भाग लिया। इस युद्ध में जसवंत सिंह के घायल होने पर जब वे जोधपुर लौटे, तो उनकी हाड़ी रानी जसवंत दे ने किले के दरवाजे बंद कर लिए थे (क्योंकि राजपूती परंपरा में हार कर लौटना अपमान माना जाता था)।
- साहित्यिक योगदान: जसवंत सिंह स्वयं एक बड़े विद्वान थे। इन्होंने ‘भाषा भूषण’ और ‘आनंद विलास’ नामक ग्रंथ लिखे।
- मुहणौत नैणसी: ये जसवंत सिंह के दीवान (प्रधानमंत्री) थे। इन्हें मुंशी देवीप्रसाद ने ‘राजपूताने का अबुल फजल’ कहा है।
- इनकी दो प्रसिद्ध पुस्तकें हैं: 1. नैणसी री ख्यात (राजस्थान की सबसे पुरानी ख्यात) और 2. मारवाड़ रा परगना री विगत (इसे ‘राजस्थान का गजेटियर’ कहा जाता है)।
- मृत्यु और औरंगजेब का कथन: 1678 ई. में अफगानिस्तान के जमरूद नामक स्थान पर जसवंत सिंह का निधन हो गया। उनकी मृत्यु का समाचार सुनकर औरंगजेब ने कहा था: “आज कुफ्र का दरवाजा (धर्म विरोध का द्वार) टूट गया।” (Aaj Kufr ka darwaza toot gaya).
7. वीर दुर्गादास राठौड़ (मारवाड़ का उद्धारक)
जसवंत सिंह की मृत्यु के बाद औरंगजेब ने मारवाड़ को ‘खालसा’ (सीधे केंद्र के अधीन) घोषित कर दिया और जसवंत सिंह के नवजात पुत्र अजीत सिंह को राजा मानने से इंकार कर दिया।
- अजीत सिंह की रक्षा: जसवंत सिंह के स्वामीभक्त सेनापति वीर दुर्गादास राठौड़ ने पन्ना धाय की तरह अपनी जान पर खेलकर कुंवर अजीत सिंह को दिल्ली में औरंगजेब की कैद से निकाला।
- 30 वर्षीय संघर्ष: दुर्गादास ने मेवाड़ के महाराणा राजसिंह के साथ मिलकर औरंगजेब के विरुद्ध 30 वर्षों तक (1678-1707) कड़ा संघर्ष किया और अंततः अजीत सिंह को जोधपुर का राजा बनाया।
- उपाधियां: कर्नल जेम्स टॉड ने दुर्गादास को ‘राठौड़ों का यूलिसेस’ (Ulysses of Rathores) कहा है। इन्हें ‘मारवाड़ का अणबिंदिया मोती’ भी कहा जाता है।
- छतरी: दुर्गादास के अंतिम दिन उज्जैन में बीते और वहीं क्षिप्रा नदी के किनारे उनकी छतरी बनी हुई है।
परीक्षापयोगी महत्त्वपूर्ण तथ्य (Important Facts for Exams)
- जोधपुर दुर्ग (मेहरानगढ़) को ‘मयूरध्वजगढ़’ और ‘गढ़ चिंतामणि’ भी कहा जाता है।
- गिरी-सुमेल युद्ध के बाद शेरशाह सूरी ने जोधपुर का प्रबंध ‘ख्वास खां’ को सौंप दिया था।
- राव चंद्रसेन की समाधि सारण की पहाड़ियों (सोजत, पाली) में ‘सचिआप’ नामक स्थान पर स्थित है, जहाँ उनके घोड़े की प्रतिमा भी है।
- जसवंत सिंह की मृत्यु के बाद औरंगजेब ने मारवाड़ पर 30 साल तक सीधे शासन (खालसा) किया था।
अभ्यास हेतु महत्वपूर्ण प्रश्न (20 Important Questions / PYQs)
प्रश्न 1: मारवाड़ के राठौड़ वंश का संस्थापक (आदिपुरुष) किसे माना जाता है?
उत्तर: राव सीहा को।
प्रश्न 2: मारवाड़ की राजधानी ‘मंडोर’ किस राठौड़ शासक ने बनाई थी?
उत्तर: राव चूंडा ने।
प्रश्न 3: जोधपुर नगर की स्थापना राव जोधा द्वारा किस वर्ष की गई थी?
उत्तर: 1459 ई. में।
प्रश्न 4: मेहरानगढ़ दुर्ग किस पहाड़ी पर स्थित है?
उत्तर: चिड़ियाटूंक पहाड़ी पर।
प्रश्न 5: आंवल-बांवल की संधि (1453 ई.) किन दो शासकों के मध्य हुई थी?
उत्तर: राव जोधा (मारवाड़) और महाराणा कुंभा (मेवाड़) के मध्य।
प्रश्न 6: मारवाड़ के किस शासक को फारसी इतिहासकारों ने ‘हशमत वाला राजा’ कहा है?
उत्तर: राव मालदेव को।
प्रश्न 7: इतिहास में ‘रूठी रानी’ के नाम से कौन प्रसिद्ध हैं?
उत्तर: रानी उमादे (राव मालदेव की पत्नी)।
प्रश्न 8: गिरी-सुमेल का युद्ध (1544 ई.) किनके मध्य लड़ा गया था?
उत्तर: राव मालदेव और शेरशाह सूरी के मध्य।
प्रश्न 9: “मैं एक मुट्ठी भर बाजरे के लिए हिंदुस्तान की बादशाहत खो देता”, यह कथन किसका है?
उत्तर: शेरशाह सूरी का (गिरी-सुमेल युद्ध के बाद)।
प्रश्न 10: गिरी-सुमेल युद्ध में राव मालदेव के कौन से दो वीर सेनापति वीरगति को प्राप्त हुए थे?
उत्तर: जैता और कूंपा।
प्रश्न 11: ‘मारवाड़ का प्रताप’ और ‘प्रताप का अग्रगामी’ किसे कहा जाता है?
उत्तर: राव चंद्रसेन को।
प्रश्न 12: अकबर द्वारा ‘नागौर दरबार’ का आयोजन किस वर्ष किया गया था?
उत्तर: 1570 ई. में।
प्रश्न 13: मुगलों की अधीनता स्वीकार करने और वैवाहिक संबंध स्थापित करने वाला मारवाड़ का प्रथम शासक कौन था?
उत्तर: मोटा राजा उदयसिंह।
प्रश्न 14: ‘मारवाड़ रा परगना री विगत’ (राजस्थान का गजेटियर) नामक प्रसिद्ध ग्रंथ के लेखक कौन हैं?
उत्तर: मुहणौत नैणसी।
प्रश्न 15: मुंशी देवीप्रसाद ने किसे ‘राजपूताने का अबुल फजल’ कहा है?
उत्तर: मुहणौत नैणसी को।
प्रश्न 16: धर्मत के युद्ध (1658 ई.) में मारवाड़ के किस शासक ने दारा शिकोह का पक्ष लिया था?
उत्तर: महाराजा जसवंत सिंह प्रथम ने।
प्रश्न 17: “आज कुफ्र का दरवाजा टूट गया”, औरंगजेब ने यह कथन किस शासक की मृत्यु पर कहा था?
उत्तर: महाराजा जसवंत सिंह की मृत्यु पर।
प्रश्न 18: मारवाड़ के राजकुमार अजीत सिंह को औरंगजेब की कैद से किसने मुक्त करवाया था?
उत्तर: वीर दुर्गादास राठौड़ ने।
प्रश्न 19: कर्नल जेम्स टॉड ने ‘राठौड़ों का यूलिसेस’ किसे कहा है?
उत्तर: वीर दुर्गादास राठौड़ को।
प्रश्न 20: वीर दुर्गादास राठौड़ की छतरी किस नदी के किनारे और कहाँ स्थित है?
उत्तर: क्षिप्रा नदी के किनारे (उज्जैन, मध्य प्रदेश में)।
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